Wednesday, April 27, 2016

मुझे आदत हैं - Poetry

नारी जीवन को दो भागो में इस आधार पे बाँट सकते हैं (१) जो वो है या होना चाहती है और (२) जो उसे होना परता है. नाड़ी जीवन शादी से पहले और शादी के बाद  एकदम अलग होता है. इस कविता को आप ऐसे भी देख सकते है (१) नाड़ी का व्यकित्व और (२) उसका सांसारिक स्वरुप! ये मेरा नजरिया है आप का शायद कुछ और हो, पढ़े और जरूर अपनी प्रतिक्रिया दें... धनयबाद !! :)
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मैं एक लेख़क हूँ 

मॉरल ऑफ़ द स्टोरी सुनाने की मुझे आदत है.


मैं एक कवि हूँ

 रेशा-रेशा से कविता बनाने की मुझे आदत है.


मैं एक राही हूँ

 हर पल चलते रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक प्रेमी हूँ

 प्रीत की रंग में रंग जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक जीवन हूँ

कठिनाई से निकलकर मुस्कुराने की मुझे आदत हैं.


मैं एक विश्वाश हूँ

अटल रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक चमक हूँ

सूखे आँखों की आशा बनने की मुझे आदत हैं.


मैं एक गीत हूँ

कोयल की कूह सी दिल में उतर जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक गीतकार हूँ

 धुनों की माला में शब्दों की मोती पिरोने की मुझे आदत हैं.


मैं एक पल हूँ

आकर चले जाने की मुझे आदत है.

मैं एक दीप हूँ

अंधेरा दूर हटाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक प्रेरणा हूँ

आगे बढ़ते रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक उम्मीद हूँ

टूट कर जुड़ जाने की मुझे आदत हैं.


मैं  एक आवाज हूँ 

जुल्मों को न सहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक ख़ुशी हूँ

छोटी-छोटी बातो पर मुस्कुराने की मुझे आदत हैं.

मैं एक उत्सुकता हूँ

कुछ नया जानने की मुझे आदत हैं


मैं एक पंछी हूँ

स्वछन्द विचरण की मुझे आदत हैं.


मैं एक श्रृंगार हूँ

खूबसूरत बने रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक धारा हूँ

निरन्तर बहते रहने की मुझे आदत हैं.

मैं एक भावना हूँ.

कोमल बने रहने की मुझे आदत हैं


मैं एक स्पर्श हूँ

अपनापन दर्शाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक नाड़ी हूँ

अपना अधिकार बचाने की मुझे आदत हैं.


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मैं एक पीड़ा हूँ

दर्द में जीने की मुझे आदत हैं.


मैं एक गाथा हूँ

 कहे-सुने जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक शक्ति हूँ

कमजोर पलो में अटूट रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक बेटी हूँ

माँ की नाज़ होने की मुझे आदत हैं.


मैं एक बहन हूँ

भैया की लाड़ली होने की मुझे आदत हैं.


मैं एक दोस्त हूँ

सुख-दुःख साझा करने की मुझे आदत हैं.


मैं एक पराया धन हूँ

 दूजे घर जाने की मुझे आदत हैं


मैं एक प्रेमिका हूँ

रीत छोर प्रीत निभाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक पत्नी हूँ

पति को सर्वस्व समझने की मुझे आदत हैं.


मैं एक प्रतीक्षा हूँ

पिया की राह देखने की मुझे आदत हैं.

मैं एक क्षमा हूँ

अक्षम्य पलो को भूल जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक ज़िद हूँ

पति के साथ के लिए लड़ जाने की मुझे आदत हैं.

मैं एक गृहिणी हूँ

 घर-संसार सजाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक कला हूँ

रिस्तो में रंग भरने की मुझे आदत हैं.


मैं एक बहू हूँ

परंपरा आगे बढ़ाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक मूर्ति हूँ

मूक बने रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक भाभज हूँ

तंज को हंस के टाल जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक धरोहर हूँ

रिवाज़ आगे बढ़ाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक माँ हूँ

ममता लुटाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक वक़्त हूँ

साथ निभाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक नाड़ी हूँ

फ़र्ज निभाते मर जाने की मुझे आदत हैं.


-चंचल साक्षी
15-04-2016
 






































Wednesday, April 13, 2016

चक्रेश मिश्र की कविता "दीप बनकर कौन आये"





शाम के गहरे रंगों से
रात का पैगाम आये |
हारकर जो सो गया मैं
दीप बनकर कौन आये |

मैं सुबह की आग हूँ
सूर्य का उच्छवास हूँ |
तिमिर का संहार करता 
मैं समय की आस हूँ |

आज हो सकता हूँ चिंतित
आज हो सकता हूँ विचलित |
लौ जो देखो फड़फड़ाती
न मान मेरी मृत्यु निश्चित |

सुबह होगी कल यहीं पर
यह भरोसा है हमारा |
न सत्य हारे फिर कहीं पर
जुनून ऐसा है हमारा |

नियति के काले रंगों से
काल बनकर मैं लड़ूंगा |
रात कितनी हो विकट पर
विजयी बनकर मैं रहूँगा |

तेरे मेरे हारे दिनों का
वही अपराजित ह्रदय हूँ |
अनजान पथ पर चल पड़ा जो
वही अपराजित ह्रदय हूँ |

एक कोशिश और करता
जयनाद की मधुर लय हूँ |
कल का अपराजित ह्रदय हूँ
आज भी अपराजित ह्रदय हूँ |

-चक्रेश मिश्र "अनजान"

Saturday, April 9, 2016

मानो या ना मानो "फ़र्क परता हैं"



 मैं आज उनलोगो के लिए लिखना चाहती हूँ जो अक्सर ये कहते है-तूम दूसरों के बारे में क्यों इतना सोचती हो, दूसरों से क्या फर्क पड़ता है। ऐसे लोगो की संख्या कम नहीं हैं जो ऐसा सोच रखते हैं। उनका मानना है कि खुद में मस्त रहो, दूसरे क्या करते है उनसे क्या लेना है। घूमना, पार्टी करना और दूसरों पे कमेंट करने वाले ये लोग शायद अपने दिमाग पे जोर देना नहीं चाहते नहीं तो ये बड़ी सामान्य सी बात है कि हमारा समाज तथा वातावरण हरेक व्यकि से बना हैं। इस तरह इंसानो की अच्छाई और बुराई एक दूसरे से जुड़ा हुआ हैं। आप बहुत अच्छे ड्राइवर हैं फिर भी दुर्घटना होना संभव है क्योंकि सामने वाला भी अच्छा ड्राइवर हो ये उसी पे निर्भर करता हैं। किसी व्यक्ति ने कार खरीद ली, उसने तो अपना भला किया अपनी सुबिधा बढ़ा लिया, पर उसने जाने अनजाने वातावरण में दूषित हवा फैला दिया। छोटे छोटे नवजात बच्चे आजकल हॉस्पिटल में साँस की बीमारी से झूझते नजर आते है तो कलेजा मुंह को आ जाता है। वाहन चालकों को, इंडस्ट्री के उन महान पूंजीपतियों को-जो बड़ी आसानी से खुली हवा में दूषित ज़हर घोल रहे है-कुछ नहीं बोल सकते। पर उनके कारनामो से सबको फर्क परता हैं। हॉस्पिटल में साँस की बीमारी से लड़ते लोगो की लाइन, महंगे महंगे दवाइया इस बात का प्रमाण है की उन्हें खुली हवा में साँस लेने से कितना फर्क पड़ा है। बात इतनी सी नहीं है, जब ये लोग अपने हैसियत का धौंस सरेआम गरीबो पे दिखाते हैं तो उनके मासूम भावनाओ पे भी फर्क परता है। 

इस तरह से हम सब इंसान चाहे-अनचाहे आपस में जुड़े हुए है। एक का साँस लेना और दूसरे का बंद हो जाने से भी फर्क परता है। भले ही हम ध्यान नहीं दें या नजरअंदाज कर दें पर हमारा हंसना-रोना दूसरे को प्रभावित करता हैं। फर्क परने से मेरा तात्पर्य ये है कि हम अच्छा करेंगे तो अच्छा और बुरा करेंगे तो बुरा प्रभाव पड़ता हैं। हरेक एक-दूसरे के हाव-भाव, चाल-चलन से प्रभावित होते है। किसी के पास अधिक धन है उसने दूसरे जरुरत मंद की मदद कर दी उसके जीवन पे कितना बड़ा फर्क पड़ा। इसी तरह किसी बेरहम ने किसी को लूट लिया उस बेचारे की तो बड़ा नुकसान हो गया।

हमारे बिच दो तरह के अच्छे लोग है एक वो जो अच्छे है पर खुद से मतलब रखते है, दूसरा वो जो अच्छे है और वो चाहते है की दूसरे भी अच्छे बने। आजकल लोग खुद अच्छे होने पे ज्यादा जोड़ देते है। बहुत अच्छी बात है। पर क्या इतना काफ़ी है? हमने तो कूड़ा नहीं फैलाया सामने वाला चाहे पूरा मोहल्ला गन्दा करदे, अपना क्या! हम तो भले है सामने वाला सरेआम गुंडागर्दी करे अपना क्या! अक्सर ऐसा देखा और सुना जा रहा है की सामने किसी ने किसी को कुचल दिया पर दूसरे उस बेहाल इंसान की मदद के वजाय उसका विडियो बनाने में लगे रहते है। हाल ही के बेहद शर्मनाक घटना 'सिद्धार्त शर्मा रोड एकसीडेंट' को देखे (जारी विडियो के अनुसार) तो आपको अंदाज़ा होगा की जहां किसी दरिंदे ने उसे रौंद दिया उस और हालत में भी एक व्यक्ति उसका बैग उठा कर चुपचाप निकल लिया। उसे उस दुर्घटना से महज़ इतना फ़र्क पड़ा की एक बैग हासिल कर लिया। कितनी शर्म की बात हैं। 


हमारी अच्छाई किसी के अच्छे के लिए न हो तो ऐसी अच्छाई, ऐसी नेकदिली का आचार तो नहीं बनाया जायेगा! सी का धन, या किसी की इज्जत बच जाये। हा सायद आपको कोई मैडल नअगर आप को लगता है की आप भले इंसान है तो आपको बेसक दिखा देना चाहिए की "भाई जो तुम कर रहे हो उससे हमे फर्क पड़ता हैं और अब हम जो करेंगे उससे तुम्हे भी फर्क पड़ेगा"! जरुरी नहीं की आप बॉलीवुड स्टाइल में दो-दो हाथ पे उतर जाये पर हाँ अपने क्षमता के हिसाब से बहुत कुछ कर सकते है। पोलिश को कॉल कर सकते है, लोगो को आवाज दे सकते है, अगर सामने वाले से तन्दुरुस्त है तो दो-दो हाथ में ही कोई नुकसान नहीं। आपके मदद से सायद किसी की जान, कि मिले, लोगो की सराहना ही मिल जाये परन्तु सबसे बड़ी बात "आपका अंतरात्मा आपको ऐसा मेडल देगा जिसके सामने दुनिया की हर मेडल किसी काम का नहीं"! 

हम सब एक आम इंसान है, हमारी छोटी-बड़ी जरूरतें तथा आशाएं हैं। इन्हे पूरा करते-करते हम पूरी जिंदगी निकल देते है। इस बिच अगर हम कुछ अच्छा कर जाये तो इससे बेहतर क्या होगा! ऐसे अनेको लोग है हमारे बिच जो बहुत कुछ कर रहे है, हमारे समाज, हमारे एनवायरनमेंट और हमारे जिव जन्तुओ के लिए पर ऐसे लोग भी है जिन्हे वाकई किसी से कोई मतलब नहीं। जो खुलकर कहते है की हाँ मैं बुरा हूँ और मुझे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता है। ये भी अच्छी बात है, जब दिन-रात, धुप-छाँव साथ चल सकता है तो अच्छे-बुरे भी सही। ऐसे लोगो को सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी की "भाई अच्छी बात है आप को दूसरे से कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर आप भी ऐसा कुछ मत करो की दूसरे को फर्क पड़े"! जैसे पडोसी सो रहे हो और आप ने वॉल्यूम बढ़ा दिया-पार्टी यूँ ही चलेगी! :) 

-चंचल साक्षी 
09-04-2016

Monday, March 28, 2016

मौसम-ए-हिंदुस्तान - Poetry




एक बार हो चुका हैं
टुकड़े-टुकड़े 
दिल-ए -जां हिन्दुस्तांन का 
बँट चुकी है धरती शरहदों में 
लगता है फिर भी नहीं बदला 
मौसम-ए-हिंदुस्तान का 

जाने कितने माँए रोइ 
कितनो का घर उजड़ा था 
हर ओर तोड़-फोड़ आगजनी 
हर चेहरा नफ़रत का मुखड़ा था 

वर्षो बीत गए 
बदल गया है बहुत कुछ 
जो बदलना था
बेहद जरुरी 
वो सोच नहीं बदली है 

हिन्दु-मुस्लिम, मंदिर-मस्ज़िद 
अभी भी जारी हैं 
आस्था के प्रतीक ही 
अब आस्था पे भाड़ी हैं 
-चंचल साक्षी

काश ऑंखें कैमरा होती - Short Story

 

 

 A moment in Local Crowd and beautiful Rain :)


तेज़ धूप के बाद बारिश की बून्द, छम-छम करके गिरती जा रही थी, थोड़ी देर में ऑटो का सफर चौक पे रुक गया।  बारिश के गिरती बूंदों के साथ लोग भी बढ़ते चले जा रहे थे। सामने मेरी नज़र एक लड़की पे गई, उसके सजने के तरीके ने साफ़ जाहिर किया 'newlywed". जब ग्रीन-सिगनल होने के बाद ऑटो चलने लगी तो दुबारा उसी लड़की पे नज़र गई। वो सड़क पार कर बाईं तरफ आ चुकी थी। उसके साथ कोई लड़का भी था। शायद दोनों 'couple' रहे होंगे।

लड़के के हाथ में छतरी और बगल में वो लड़की, ऊपर से बारिश की छम -छम गिरती तेज़ बुँदे जो बढ़ती ही जा रही थी। वो दृश्य इतना परफेक्ट था की मन में ख्याल आया की काश ऑंखें कैमरा होती!



(ये स्टोरी मैंने उसी वक़्त शेयरिंग ऑटो के भीड़ में बैठे हुए मोबाइल में टाइप की थी। इसे मैंने 'ममूरा चौक पे 19 जून 2014 को देखि और लिखी थी)

-चंचल साक्षी

Thursday, March 10, 2016

आम नागरिक होने के फ़ायदे - BENIFITS OF BEING A COMMON PEOPLE






 
आम नागरिक होने के बहुत से फ़ायदे हैं आप जो चाहे जब चाहे बोल सकते हैं
चाहे किसी नेता की ऐसी तैसी करनी हो या किसी व्यक्ति विशेष की। कभी कभी कुछ लोग इस फायदे का कुछ ज्यादा ही उपयोग कर लेते हैं। उन्हें लगता है की वो फलां नेता से ज्यादा बेहतर हो सकते है या फलां व्यक्ति से ज्यादा अच्छा व्यक्तित्व उनका है। पर सोचने वाली बात ये है की आप इतने ही क़ाबिल और अच्छे हो तो उनकी जगह आप होते नही?

गीदड़ो की फ़ितरत होती हैं साथ में हुयां-हुयां करना पर इंसान भी कुछ ऐसे ही बर्ताव करते है। किसी भी मुद्दे पे वे इसलिए भड़क जाते हैं क्योंकि उनकी समुदाय/जात/बिरादरी को उस मुद्दे से प्रॉब्लम हैं। एक साथ तोड़ फोड़ और खून खराबे पे आमदा हो जाते है। भीड़ का हिस्सा बनने से पहले एक बार इंसान होने का परिचय तो दो। अपने दिमाग का इस्तेमाल तो करो की क्या ये सही हैं ? देश में अभी कई गंभीर मुद्दे है जिसपे बोलने से पहले उस बात की सही जानकारी होनी बेहद जरुरी है। पर लोग किसी न किसी तरह इन्फ्लुएंस होकर शोर मचने में लग गए हैं। चाहे कन्हैया का समर्थन हो या उसका बिरोध। क्या उसका समर्थन करने से देश का भला हो जायेगा? जिस इंसान को देश की बर्बादी का एक मात्र कारन भाजपा और आरएसएस नज़र आता है। उसका कोई विचार आतंकवाद जैसे खतरनाक समस्या पे साफ़ नही है। जिसने न्यूज़ चैनल के दिए इंटरव्यू में इस बात का कोई जबाब नही दिया की अफजल गुरु को फांसी की सजा कोर्ट ने सुनाया था तो हत्यारा भाजपा कैसे हो गया? या वो कई अफसरों की हत्यारा अफजल गुरु का समर्थन करके वो देश को कैसे आजादी दिलाएगा? और दूसरी तरफ जो लोग उसके खिलाफ है उनलोगो ने ज्यादा उसे हाईलाइट किया है। लेकिन इसके बाबजूदभी किसी को कोई हक़ नही की उसे मार पिटाई करे।