Friday, October 4, 2013

रचयिता : महफिल-ए वीबी के चर्चे।

रचयिता : महफिल-ए वीबी के चर्चे।: महफिल-ए वीबी के चर्चे।  जब घर में एक कामवाली आती है तो श्रीमान जनाब का ख़ुशी संभाले नही संभालता। उसके द्वारा बनाए गए खाना बेहद स्वाद...

Saturday, September 21, 2013

महफिल-ए वीबी के चर्चे।

महफिल-ए वीबी के चर्चे। 

जब घर में एक कामवाली आती है तो श्रीमान जनाब का ख़ुशी संभाले नही संभालता। उसके द्वारा बनाए गए खाना बेहद स्वादिस्ट लगने लगता है। तन्खाह के साथ साथ उसे तारीफे भी हासिल होती है। वही श्रीमान जनाब बीवी लाते है तो नखरे आसमान छुने लग जाता है। उनके अन्दर का जज साहब अचानक जाग उठता है। फिर शुरु हो जाता है मीनमेख निकलना, नमक कम तेल ज्यादा इत्यादी। इन्हें एक दिन भी पत्नी महोदया बनकर रहना पर जाये तो होश ठिकाने आ जाये। इसके वाबजुद जनाब पति महोदय फ़ब्तिया कसने को अपना आदत बना लेते है। जहा-तहा पत्नी लीला और चर्चा करते पाए जाते है। अजी जनाब मनोरंजन की ऐसा भी क्या लत की आपने अपनी संगिनी तक को नही बख्शा।

ऐसे में अगर दो-चार दोस्त मिल जाये तो महफ़िल जम ही जाता है। महफ़िल जमी तो बातें भी होगी? पहले तो रोजमर्रा के काम-धंधे फिर फलां का फलां से अफेयर और दुनिया भर की बातें। जब हर बात अपनी मंजिल तक पहुच गयी तब क्या? सबके घर को भेद लिया रह गया तो सिर्फ अपना घर। घर में बांकी सब तो अपने है, माँ-बाप, भाई-बहन। सिर्फ एक प्राणी है जो बाहर से आई है-वीबी। अब वीबी के नाम पर जनाब दिल हल्का करेंगे। वीबी जो आजकल महफिलो का मुद्दा, सायरो की शायरी, पतियों का भरास और सोसल साइट्स का हाईलाइट बनी हुई है।

बैक टू द पॉइंट, फिर शुरु हुआ महफ़िल-ए-वीबी के गुणगान। अजी गुणगान भी ऐसा की बोतल भले ही खत्म हो गया हो पर शब्दवान खत्म नही हुआ। "वीबी ने जिना मुस्किल कर दिया है", ये सबसे समान्य वाक्य है। वैसे आप तो खुद भुक्तभोगी है पर इस का बयाँ करते चलें।

जाम से जाम टकराया और दिल की बात जुबान पर आ ही गयी। दिल में जो भी आया तथाकथित दोस्त को बोल दिया। यार बहुत चिक-चिक करती है, सिगरेट न पीया करो, शराब को तो हाथ भी मत लगाना, घर जल्दी आया करो। दोस्त ने जबाब दिया, "हाँ यार अपना भी कुछ यही हाल है"। बहुत पकाति हैं, घर जाने का मन नही करता है।

ये तो मात्र एक उदाहरन है। बल्कि सही मायने में घर हो या ऑफिस हर पति महोदय के जुबान पर अपनी महोदया के लिए आह ही होती है। सायद आपको हैरानी ना हो यह जानकर कि 60-65 साल का एक बुजुर्ग अपने स्टाफ से अपनी वीबी की बुराई करता है। शब्दों से यह दर्शाता है की अपनी महोदया को धुल्मात्र समझता है। ऐसा प्रतीत होता है की अगर दो अन्जान व्यक्ति भी साथ में मिल जाये तो भी अपनी वीबी की बुराई करने से बाज नही आएंगे।

मस्ती-मजाक अपनी जगह है पर कभी आपने इसकी गभीरता के बारे में सोचा है? ऐसा होता क्यू है? कुछ लोगो को अन्यो से कोई सरोकार नही होता है, ऐसे लोग नही होने के बराबर है। परन्तु ये सवाल उनसे है जिन्हें दुसरे से फर्क परता है।

मैं चर्चा कर रही थी विबियो पर कसे जाने वाले फ़ब्तियो पर। अच्छी बात है जनाब आप अपना मतोजागर करें, बेसक आपको इसक हक़ है, पर इससे क्या हासिल होगा यह भी सोच ले। वीबी जो एक दिन किसी की बेटी के रूप में लाडली थी। वीबी जो पहले आपकी प्रेमिका थी। आज आपके लिए पकाऊ हो गयी है। एक लड़की जिसके लिए आप घंटो धुप में घरे होकर टकटकी लगाए देखा करते थे। जिसकी एक झलक पाने के लिए कितनी जद्दोजहद करते थे। उससे दोस्ती के लिए क्या-क्या किया था। उसके पास रहने की हरेक कोशिस करते थे। सोयी-जगी आंखो से उसके सपने देखा करते थे। फिर कायनात ने आपका साथ दिया वो आपकी दुल्हन बन गयी। आप उस दिन सबसे खुशनसीब थे, ख़ुशी आपके धरकने बढ़ा रही थी। दिन गुजरा, महीने गुजरे और गुजर गया साल। साथ ही आपने बना लिया बुरा हाल। आखिर क्यों?

हमारे एक मित्र है जो शादिसुदा है। वे दुसरे मित्र, जीनकी शादी हो रही थी, से बोले, "एक-दो महीने बाद तुम्हे कुछ अच्छा नही लगेगा"। ये तो कुछ ज्यादा हो गया। परन्तु हकीकत यही हैं कि अधिकतर पुरुषो की यही मानसिकता होती है। आप अगर ध्यान दे तो 5-7 उदाहर आपके अपने सर्कल में मिल जायेंगे। आजकल फेसबुक पे अक्सर ऐसा दीखता है- "got married to_____, कुछ शादी के तस्वीर भी साथ में"। वही एक-दो महीने बाद वीबी के उपर शेरो-शायरी और कटाक्ष-कविताये। जाहिर है ये सब तो चलता रहेगा। परन्तु मैं पुरुषो की मानसिकता समझना चाहती थी। आखिर वे ऐसा क्यू करते है? जहां तक मैं समझ पाई हूँ अभीतक,शायद निम्न कारणों से वे ऐसा सोचते है-
१. जिम्मेदारी रहित ख़ुशी चाहिए, अर्थात प्यार मिले परन्तु बिना किसी commitment के या जिम्मेदारी के। 
२. स्वार्थपूर्ति में ज्यादा यकीन रखते है, अर्थात अपनी ख़ुशी, अपना मूड और अपने लाइफस्टाइल को ज्यादा तवज्जो देते है। 
३. वीबी को जीवन साथी कम बल्कि उपलब्धि ज्यादा समझते है। 

वैसे तो कई कारण और भी है परन्तु उपरोक्त कारन मुख्य कारण हो सकता है। जैसा की मानव स्वभाव है, जो वस्तु हमे हाँसिल नही होता है, उसका लगन, लालच और कीमत हमारे नजर में अधिक होती है। वही वस्तु हमे जब हासिल हो जाये तो उसका कीमत हमारे नजर में कम हो जाता है। परन्तु हम इन्सानो में इतनी अक्ल तो है कि व्यक्ति और वस्तु में फर्क समझ सकें। यंहा बात पुरुषों की है, और पुरुष खासकर पति महोदयो की तो बात ही निराली है। शायद उन्हें वीबी भी उपलब्धि लगता हो! 

मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना है की आप और हम कुछ ऐसा करें कि सबकी मानसिकता बदले। ताकि पति महोदय जो हम में से किसी का भाई, किसी का चाचा या रिश्तेदार है, वो अपनी महोदया की बात को सकारात्मक तरीके से ले, न की ताने समझे। जनाब जरुरत पड़ने पर अपनी महोदया से अपने मन की बात बताये, अपनी समस्याएँ बताए। सोच के देखे, जिस प्यार ने उसे आपकी पत्नी बनाया उसी प्यार में वह आपकी बात नही समझेगी? जितना जतन आपने इस प्यार को पाने के लिए किया था उसका एक तिहाई इस रिश्ते को बनाने के लिए कर ही सकते है। हर संभव कोशिस करें, वो प्यार, वो नयापन, वो जज्बात बरकरार रखने की, क्योंकि अगर आप एक कोशिस करेंगे तो वो चार करेगी। अपने रिश्ते को झेले मत बल्कि पुरे जोश-ओ-जूनून से जिए। क्योंकि वो कहते है ना जिंदगी मिलेगी ना दुबारा। 

-चंचल साक्षी 
06/09/13

Thursday, May 30, 2013

तारीफ

तारीफ



वो शब्द कुछ इस कदर फरमा गए 
तारीफ भी जिनसे बेशक शर्मा गए। 

कह-कहे ज़माने की खूब सुनी थी मैंने 
चन्द अल्फाज़ उनके 
हर गम भुला गए। 

उनके आँखों के इशारे 
मेरी हया चुरा गई 
फिर मिलते रहने की 
उम्मीद जग गए।

हर पल ऐसा है 
वो नजरो में बसते है 
वो अपने जीवन की 
मुझे धडकन बना गए।

                  -साक्षी  
   (Dated: 30-05-13)

Saturday, January 26, 2013

fighting for India


Fighting For India

हममे कुछ तो है,
हमने माना है
ऐसा कुछ 
जिसे हमे पाना है।  

धुनें देश-हित की, 
रोंगटे खड़ी करती। 
गाथाएँ- 'बाई', 'बोस' की, 
उम्मिदे बड़ी करती। 
ऐसा क्या है-
जिसे पा सकते नहीं ?
बला चाहे जो हो-
हम मिटा सकते नही !

हम युवा-देश हित में-
लड़ते रहेंगे,
फ़र्ज़ पूरा कर रहे है,  
करते रहेंगे।

जातीवाद, आतंकवाद,
और नाड़ीहिंसाएँ, 
हमारी हिम्मत को-
रोक न पाए ये बालाएं। 

हे देश के युवा-धड़कन !
मिन्नति ये करती हुं 
जो हुआ या हो रहा है 
उसके वास्ते विनती करती हुं ।

अपने दिल की सचाई को 
कभी नहीं दबाना 
स्वाभिमान को अपने 
कभी नही गवाना 

जय हिन्द !! 
            - चंचल साक्षी 
              Dated: 26th Jan, 13

(Inspiration: H-TV Show, Fighting for India,
 Character-Subhash Chndra Bose,
 Jhanshi Ki Rani Regiment and B.R Ambedkar

Monday, December 24, 2012

एक ख्याब



एक ख्याब 

एक ख्याब कुछ ऐसे
भोर की किरण हो जैसे 

चाँद छूने की आस नहीं 
असमान में उड़ने की प्यास नहीं 
ख्याब तो है धरती पर-
जीवन संवारू 
दुख-दर्द मिटाऊ 
मानवता को सार्थक कर 
खुशिया फैलाऊ
निरासाओ को आस 
अँधेरे में प्रकाश हो जैसे  

एक ख्याब कुछ ऐसे 
पूर्णिमा की चाँद हो जैसे 

खुशियों के लिए इन्सां- 
पैसो पर न हो निर्भर 
चंद कागज के टुकड़े-
बाटें न जीवन 
जीव को जीव से ही प्यार हो 
धन-दौलत का- 
केवल न सत्कार हो
हर रंग मिलकर 
इन्द्रधनुष बनाये जैसे 

एक ख्याब कुछ ऐसे
दीपक की जगमगाहट हो जैसे 

मर कर भी मै मर न पाऊ 
ऐसा कुछ मै कर जाऊ 
इस धरा पैर सदा-सर्वदा
मानवता के लिए जानी जाऊ
आस भी यही और
प्यास भी यही
जीवन का एहसास भी यही 
ऐसा क्या मै कर पाऊँगी ?
कर जाऊ भी तो कैसे ?   
                    -चंचल साक्षी 
                     24th Dec,12

Wednesday, October 31, 2012

प्यारी माँ


!! प्यारी माँ !!

तुमने इतना प्यार दिया माँ 
जग की खुसिया वार दिया माँ 
तुम सा  कोई नहीं  
तुम बिन कोई नहीं माँ 
तुम न होती तो  
कुछ भी न होता माँ 

तुम कहती हो  
मैंने पहला शब्द-
मामा बुलाया था माँ 
पर वो तो माँ-माँ था  
तुम्हे दो बार पुकारा था माँ 
तुम इतनी प्यारी हो  
इस जग से न्यारी हो माँ 
तुम न होती तो 
कुछ भी न होता माँ

मै हँसु तो तुम खुश 
मै रोउ तो तुम रोती हो माँ 
अभी भी याद है मुझे 
तेरा बेचैन होना माँ 
मेरे पीछे रस्ते पे नैन होना 
जबतक मै घर न आऊ तुम इंतजार करती थी माँ 

मुझे याद है तेरा गुस्सा करना 
और दिल ही दिल में दुलार करना माँ 
छोटी-छोटी गलतियों पे टोकना 
और कु-रास्तो को रोकना माँ 

तुम इतनी क्यों अच्छी हो 
निर्मल जल सी सच्ची हो माँ 
                              -चंचल साक्षी 
                               31st Oct, 12

Wednesday, September 5, 2012

नजराना


नजराना क्या लिखू-
मै तेरे प्यार का 
रास्ता जोहती हूँ 
तेरे ऐतवार का 
तुम ओ जालिम 
मुझे भुलाये बैठे हो
जाने किसका आँगन-
सजाये बैठे हो
दिल में सवालो की
झरिया उमरती-घुमारती
मन मेरा फिर भी
कुम्हलाये बैठी है
एक नजर देख तो जाते
इतने बेगाने हम नहीं
किस ओट में-
हमदम शर्माए बैठे हो
जिस डगर से गुजरे थे
पास खरी थी मै
कुछ बोल तो जाते क्यों-
घवराये बैठे हो
 आशिकी-दीवानगी
 कहने की-बात नहीं 
हम अपना सबकुछ-
गवाएं बैठे है.
 नजराना क्या लिखू-
गम-ए यार का
रास्ता जोहती हूँ 
तेरे प्यार का
               -चंचल साक्षी
                 04-Sep, 2012