Posts

Featured Post

मानो या ना मानो "फ़र्क परता हैं"

Image
मैं आज उनलोगो के लिए लिखना चाहती हूँ जो अक्सर ये कहते है-तूम दूसरों के बारे में क्यों इतना सोचती हो, दूसरों से क्या फर्क पड़ता है। ऐसे लोगो की संख्या कम नहीं हैं जो ऐसा सोच रखते हैं। उनका मानना है कि खुद में मस्त रहो, दूसरे क्या करते है उनसे क्या लेना है। घूमना, पार्टी करना और दूसरों पे कमेंट करने वाले ये लोग शायद अपने दिमाग पे जोर देना नहीं चाहते नहीं तो ये जग जाहिर है कि हमारा समाज तथा वातावरण हरेक व्यकि से बना हैं। इस तरह इंसानो की अच्छाई और बुराई एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। आप बहुत अच्छे ड्राइवर हैं फिर भी दुर्घटना होना संभव है क्योंकि सामने वाला भी अच्छा ड्राइवर हो ये जरुरी तो नहीं। किसी व्यक्ति ने कार खरीद ली, उसने तो अपना भला किया अपनी सुविधा बढ़ा लिया, पर उसने जाने अनजाने वातावरण में दूषित हवा फैला दिया। छोटे छोटे नवजात बच्चे आजकल हॉस्पिटल में साँस की बीमारी से झूझते नजर आते है, उन  मासूम बच्चों को हॉस्पिटल में देख कलेजा मुंह को आ जाता है। इंडस्ट्री के उन महान पूंजीपतियों को-जो बड़ी आसानी से खुली हवा में दूषित ज़हर घोल रहे है-कुछ नहीं बोल सकते। पर उनके कारनामो से सबको फर्क परता हैं।…

मुझे आदत हैं - Poetry

Image
नारी जीवन को दो भागो में इस आधार पे बाँट सकते हैं (१) जो वो है या होना चाहती है और (२) जो उसे होना परता है. नाड़ी जीवन शादी से पहले और शादी के बाद  एकदम अलग होता है. इस कविता को आप ऐसे भी देख सकते है (१) नाड़ी का व्यकित्व और (२) उसका सांसारिक स्वरुप! ये मेरा नजरिया है आप का शायद कुछ और हो, पढ़े और जरूर अपनी प्रतिक्रिया दें... धनयबाद !! :)
-------------------- + --------------------- + ---------------------- + ---------------------------





















मैं एक लेख़क हूँ 

मॉरल ऑफ़ द स्टोरी सुनाने की मुझे आदत है.


मैं एक कवि हूँ

 रेशा-रेशा से कविता बनाने की मुझे आदत है.


मैं एक राही हूँ

 हर पल चलते रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक प्रेमी हूँ

 प्रीत की रंग में रंग जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक जीवन हूँ

कठिनाई से निकलकर मुस्कुराने की मुझे आदत हैं.


मैं एक विश्वाश हूँ

अटल रहने की मुझे आदत हैं.


मैं एक चमक हूँ

सूखे आँखों की आशा बनने की मुझे आदत हैं.


मैं एक गीत हूँ

कोयल की कूह सी दिल में उतर जाने की मुझे आदत हैं.


मैं एक गीतकार हूँ

 धुनों की माला में शब्दों की मोती पिरोने की मुझे आदत हैं.


मैं एक पल हूँ

आकर चले ज…

चक्रेश मिश्र की कविता "दीप बनकर कौन आये"

शाम के गहरे रंगों से
रात का पैगाम आये |
हारकर जो सो गया मैं
दीप बनकर कौन आये |

मैं सुबह की आग हूँ
सूर्य का उच्छवास हूँ |
तिमिर का संहार करता 
मैं समय की आस हूँ |

आज हो सकता हूँ चिंतित
आज हो सकता हूँ विचलित |
लौ जो देखो फड़फड़ाती
न मान मेरी मृत्यु निश्चित |

सुबह होगी कल यहीं पर
यह भरोसा है हमारा |
न सत्य हारे फिर कहीं पर
जुनून ऐसा है हमारा |

नियति के काले रंगों से
काल बनकर मैं लड़ूंगा |
रात कितनी हो विकट पर
विजयी बनकर मैं रहूँगा |

तेरे मेरे हारे दिनों का
वही अपराजित ह्रदय हूँ |
अनजान पथ पर चल पड़ा जो
वही अपराजित ह्रदय हूँ |

एक कोशिश और करता
जयनाद की मधुर लय हूँ |
कल का अपराजित ह्रदय हूँ
आज भी अपराजित ह्रदय हूँ |

-चक्रेश मिश्र "अनजान"

मौसम-ए-हिंदुस्तान - Poetry

Image
एक बार हो चुका हैं टुकड़े-टुकड़े  दिल-ए -जां हिन्दुस्तांन का  बँट चुकी है धरती शरहदों में  लगता है फिर भी नहीं बदला  मौसम-ए-हिंदुस्तान का 
जाने कितने माँए रोइ  कितनो का घर उजड़ा था  हर ओर तोड़-फोड़ आगजनी  हर चेहरा नफ़रत का मुखड़ा था 
वर्षो बीत गए  बदल गया है बहुत कुछ  जो बदलना था बेहद जरुरी  वो सोच नहीं बदली है 
हिन्दु-मुस्लिम, मंदिर-मस्ज़िद  अभी भी जारी हैं  आस्था के प्रतीक ही  अब आस्था पे भाड़ी हैं  -चंचल साक्षी

काश ऑंखें कैमरा होती - Short Story

Image
A moment in Local Crowd and beautiful Rain :)
तेज़ धूप के बाद बारिश की बून्द, छम-छम करके गिरती जा रही थी, थोड़ी देर में ऑटो का सफर चौक पे रुक गया।  बारिश के गिरती बूंदों के साथ लोग भी बढ़ते चले जा रहे थे। सामने मेरी नज़र एक लड़की पे गई, उसके सजने के तरीके ने साफ़ जाहिर किया 'newlywed". जब ग्रीन-सिगनल होने के बाद ऑटो चलने लगी तो दुबारा उसी लड़की पे नज़र गई। वो सड़क पार कर बाईं तरफ आ चुकी थी। उसके साथ कोई लड़का भी था। शायद दोनों 'couple' रहे होंगे।
लड़के के हाथ में छतरी और बगल में वो लड़की, ऊपर से बारिश की छम -छम गिरती तेज़ बुँदे जो बढ़ती ही जा रही थी। वो दृश्य इतना परफेक्ट था की मन में ख्याल आया की काश ऑंखें कैमरा होती!

(ये स्टोरी मैंने उसी वक़्त शेयरिंग ऑटो के भीड़ में बैठे हुए मोबाइल में टाइप की थी। इसे मैंने 'ममूरा चौक पे 19 जून 2014 को देखि और लिखी थी)

-चंचल साक्षी

आम नागरिक होने के फ़ायदे - BENIFITS OF BEING A COMMON PEOPLE

Image
आम नागरिक होने के बहुत से फ़ायदे हैं आप जो चाहे जब चाहे बोल सकते हैं चाहे किसी नेता की ऐसी तैसी करनी हो या किसी व्यक्ति विशेष की। कभी कभी कुछ लोग इस फायदे का कुछ ज्यादा ही उपयोग कर लेते हैं। उन्हें लगता है की वो फलां नेता से ज्यादा बेहतर हो सकते है या फलां व्यक्ति से ज्यादा अच्छा व्यक्तित्व उनका है। पर सोचने वाली बात ये है की आप इतने ही क़ाबिल और अच्छे हो तो उनकी जगह आप होते नही?
गीदड़ो की फ़ितरत होती हैं साथ में हुयां-हुयां करना पर इंसान भी कुछ ऐसे ही बर्ताव करते है। किसी भी मुद्दे पे वे इसलिए भड़क जाते हैं क्योंकि उनकी समुदाय/जात/बिरादरी को उस मुद्दे से प्रॉब्लम हैं। एक साथ तोड़ फोड़ और खून खराबे पे आमदा हो जाते है। भीड़ का हिस्सा बनने से पहले एक बार इंसान होने का परिचय तो दो। अपने दिमाग का इस्तेमाल तो करो की क्या ये सही हैं ? देश में अभी कई गंभीर मुद्दे है जिसपे बोलने से पहले उस बात की सही जानकारी होनी बेहद जरुरी है। पर लोग किसी न किसी तरह इन्फ्लुएंस होकर शोर मचने में लग गए हैं। चाहे कन्हैया का समर्थन हो या उसका बिरोध। क्या उसका समर्थन करने से देश का भला हो जायेगा? जिस इंसान…

धुंध - A poetry on current situations

Image
जो दिखता है वो सच है  या समय की मांग (demand) मानो जाड़े के आने से  एक धुंध सी लगी हो  जिसने सबकुछ ढंक रखा हो  अपने बाँहो में  सिर्फ सामने जो है  वही दिखता हो  और जो सामने दिखता है  वह है स्वार्थ में लिपटे असंख्य लोग  जिन्होंने पल-पल को बाँट रखा है  फायदे और नुकसान के तराज़ू से इस दृष्य में व्यग्रता है  और छटपटाहट  सब भागने में लगे है  किस ओर और क्यूँ  मालूम नही  सबसे बड़ी व्यथा ये है  की प्रेम की परिभाषा बदल गयी है  या प्रेम करने की सोच  पर अजीव बदलाव है ये  Demand and Supply के इस चेन में  हर समीकरण बदल गया है लोग पूरी जिंदगी की ख़ुशी  एक पल में हांसिल कर लेना चाहते है  इंसान मृत्यु के डर से घबरा गया है  या ज्यादा चतुर हो गया है  ये तो नही जानती  परन्तु एक बात है- जो लोग प्लान करके बैठे है  सालो का  उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नही  आनेवाला पल कैसा होगा  क्योंकि  इंसान भले ही खुद को तेज़ समझे  प्रकृति से परे स्वंय देव भी नहीं 
पर मुझे विश्वास है  वक़्त बदलेगा  और समय की मांग भी  फिर यह धुंध भी छंट जाएगी  उस दिन सब साफ नजर आएगा। 
-चंचल साक्षी  10/01/2016

हाँ, फ़र्क परता है - Poetry

Image
क्या फ़र्क परता है  सामने मंदिर या मस्ज़िद  चर्च या गुरुद्वारा है  प्रार्थना को बस हाथ उठना चाहिए  अपने 'ईश' के ईबादत में  सर झुकना चाहिए  इंसान का इंसान से प्रेम होना चाहिए  क्या लिवाश क्या रंग  भेद मिटना चाहिए

हाँ, फ़र्क परता है! जब मन में मैल हो  छोटी छोटी बातो पर  करना जब बैर हो  दया की जगह जब  क्रूरता आ जाए  इंसान को देखकर हैवानियत भी शर्माय!!
-चंचल साक्षी  २९-१२-२०१५