Monday, June 22, 2015

घुटन

इन दिनों दर्द हैं सीने में 
आता नही मज़ा 
घुट-घुट कर जीने में 
मेरी परछाई भी मुझसे 
सवाल पूछने लगे 
लाख कोशिश करू 
तूफ़ान उठने लगे 
सब फ़ीका-फ़ीका लगने लगा 
रिस्तो से भरोषा अब उठने लगा 
.........x.........x............x.......

दिल करे हर बंधन तोड़ दू 
तन्हाई से फिर नाता जोड़ लू 
कुछ वक़्त मिले इन स्वांग से
उन्मुक्त हवा में सांस लू 
और गम का दामन छोड़ दू 
......x.......x..........x.........

किया-धरा सब धूल में मिल गया 
मनो जैसे रेत का महल बनाया हो 
नासमझ दिल को मैंने लाख समझाया 
फिर भी बावड़ी ने इश्क़ फ़रमाया 
-चंचल साक्षी 

हमसफ़र

मिलो सफर किया 
जिस हमसफ़र के लिए  
हमारा मंजिल अलग हैं 
वह कहकर चल दिए 

मित- मित कहकर जिसे 
मनमीत बनाया हमने 
तुम भला किस लायक 
वह कहकर चल दिए 

लाख बाधाएं पार कर 
जिसे पाया हमने 
मेरे राह की बाधा हो तुम 
वह कहकर चल दिए 
-चंचल साक्षी 

दर्द-ए-बयाँ

यूँ न हँसो यारो 
मेरे दर्द-ए-बयाँ पे 
हज़ारो चोट खाकर ही 
हमने ये हुनर पाई है 

इस दर्द-ए-दिल का अब क्या करुँ 
लाख बाधा पार कर जिसे जीत न मिली 

यूँ ही नाउम्मीद नही हूँ मैं 
मेरे अश्क़ मेरे हाला के बेहतर गबाह हैं 

ये इश्क़ भी यारो क्या अजीब चीज है 
न मिले तो बावड़ा मिल जाये तो बेकार कर देती हैं 
-चंचल साक्षी 

Sunday, June 21, 2015

गम

गर मिले गम कभी 
मित्रो मत घबराना 
उसी पल आईने के सामने जाना 
देख आईने में खुद को 
मंद-मंद मुस्काना 
परिस्थिति भले न बदले 
हौशला जरूर बढ़ जायेगा 
गम भी गम खाकर 
दूर कही चला जायेगा 
- चंचल साक्षी 

Expressions

पि को ढूंढन मैं चली 
ढूंढा जग संसार 
जग मुया तो मिल गया 
मिला न पि का प्यार 
-चंचल

Nikita Singh पि तेरे मन बसा, 
ढूंढा जग - संसार,
मन में पि था हँस रहा,

मूँद नयन - खोल मन का द्वार!


हाँ बसा पि मन मेरे 
क्यूँ ढुंढू जग संसार 
नयन मुंद उसे ध्याऊ मैं 
फिर भी न आया पि को प्यार 
-चंचल साक्षी 

Saturday, June 20, 2015

नन्ही चिड़िया

एक नन्ही चिड़िया जो बड़े जतन से खुद को संभाला
उन तूफानों में
जब सबने उसके घोषले को उजाड़ा 
माँ सहीत उसे बाहर निकाला
चिड़िया ने दुर देश जाने का सोचा
अपनी माँ को दिया भरोषा
माँ मैं दूरदेश जाऊंगा
तुम्हारे दुःख-दर्द मिटाऊंगा
बहुत सारा धन लेकर
लौट मैं आऊंगा
माँ सोची की बच्चा हैं
दिल से बिल्कुल कच्चा हैं
चलु मैं भी साथ
फिर गम की क्या बिसात
दोनों पहुंचे परदेश
छोड़ कर अपना देश
यहाँ कोई न अपना था
मानो जैसे सपना था
माँ ने पंख फैलाया
नन्ही चिड़िया को हर्षाया
बच्चे तुम न घबराओ
तुम अपनी पहचान बनाओ
तिनका तिनका चुनकर 
उम्मीदों से बुनकर 
नन्ही चिड़िया ने घोषला बनाया 
अपने घर को फिर से सजाया 
माँ बोली तुम जम गये
काम में अपने रम गये
लो चलो मैं देश चली
छोड़कर परदेश गली
नन्ही चिड़िया मुसकाई
माँ जब गले लगाई

दो चार अब दोस्त हैं
नन्ही चिड़िया मस्त है
रह रह कर नन्हे को
याद घर की आती है
अनायाश आँशु बह जाती है
माँ भी साथ नही अब
जो प्यार किया करे
परदेश वाले सिर्फ व्यापर किया करे
यहाँ परदेश में सबकुछ है
पर वह बात नही है
सुख सुबिधा अनेको है
वो जज्बात नही
हाँ वो जज्बात नही है 
-चंचल साक्षी
20/06/2015

Thursday, June 18, 2015

मैं रुपया हूँ

मैं रुपया हूँ 
लोग भले मुझे हाथ की मैल कहते है 
पर मेरे लिये लोग जान लेते है जान दे भी देते है 
मैंने अनगिनत अमीरजादों के पाप धोये है 
असंख्य नेताओं के कालिख़ मिटाये है 
बड़े बड़े काले धंधों से मुझे गुज़ारा गया है 
पग-पग पर हेरा-फेरी में मुझे उतारा गया है 
हाँ भले ही मैं कागज का टुकड़ा हूँ 
लोगो के इरादे का पर मैं मुखड़ा हूँ 
कहानी मेरी हज़ारो साल पुरानी है 
जैसे पुरानी नानी की कहानी है 
निर्माता ने बुनियादी चीजो के लिए मुझे बनाया था 
लोगो ने खुली बाँहो से मुझे अपनाया था 
पर आज मैं हर ताले की चाभी हूँ 
हाँ मैं जन जन पर हावी हूँ 
आज जरुरत की जगह लालच छाया है 
तभी लोग मुझे कहते मोह माया है 
भले दुनिया विधाता ने बनाया होगा 
प्रकृति के कण-कण को प्यार से सजाया होगा 
पर दुनियाभर को मैंने ईशारे पे नचाया होगा 
क्योंकि मैं रुपया हूँ 
-चंचल साक्षी 
18/06/2015

Tuesday, June 9, 2015

Short Story

The Unknown caller.


Tring Tring….
My mobile phone rang and I picked up the call. 
Hello is this Abhisekh, the caller said. No wrong no, please check and redial, I replied. Is this 9899****01, caller asked. Yes it is, but it’s my no. Oh sorry, may be I wrote the wrong number given by him, he clarified. Its okay, I said and hanged up the call.

I got busy in my works. After a while, my mobile got a massage. A massage send by unknown person asking something, text was, “Hi, can I say something? I replied who is this? It was the same caller. Questions raise in my mind like who is this? What he wants to say and why? Why should I reply him? After questioning myself I replied him as I didn't recognise him. Oh ok, say, I replied.

His next message was quit surprise to me. He complemented my voice. I thought is it a trick? Is it a way to talk to a girl by dialing wrong no? His message was, “Please don’t get me wrong. But you have a very unique and soothing voice. Couldn't resist saying this. Please don’t misunderstand me.” 

I simply wanted to say thanks because I personally believe to complementing people. Generally if we roaming around and get some people with a dashing personality or nice behavior we like it. So many times we wanted to complement the person but we don’t. Because the person can take it wrong. It seems not normal to complementing unknown people. I replied him, “okay.”

At the same time I was thinking about other people in my situation; who entertains wrong no? What if the unknown caller is trying to flirt or doing the same thing for what wrong no is famous for. I heard so many happening about it that a person called wrong no and they get into relation or sometimes it results a crime. So many questions raised in my mind. But there is one thing which saying me to reply and that is my curiosity about human psychology. I like to know humans mind and behavior. This is only the reason I replied him.

Again he messaged, “At least a thank you is expected after a nice n true compliment. Apne 1 thanks bhi nhi kaha. Anyway. Its okay.” I was in doubt. Firstly, he was trying to continue the conversation and nothing was objectionable but secondly, he was not known to me. Still I wrote him, “Isn't it strange? I don’t know u and u r giving me compliment…anyway thanks.”   

I guessed he may be an artist, because an artist who lives in a world of dreams can do what is not normal.  He/she prefers his heart’s voice not the world’s rule. It is my personal thought. Anyways I got his next message. He replied, “There are many things which appear to be strange in life. In fact our life is strange too. 

He got my name from true caller. After asking me that, are you an artist? He said not by profession but by behavior and nature. I couldn't understand what he wanted to say. Because being an artist is a nature itself and it’s a talent by birth.  People make it profession by choice. Otherwise an artist can live without food but can't live without his/her imagination.

After sometime he messaged me again. He wrote that “maine koi naarazgi wali baat kar di kya? Aap to sayad khafa ho gaye. Being a frank I replied, “No, I’m busy.” His last reply was, “ok I’ll wait for your text very patiently. Have a blessed Wednesday.

I’m smiling and thinking on this conversation with the unknown caller. Sometimes unknown people make us smile and we smile in reply. But there is a fear behind it. The fear is being victim of crime or trap in a trouble…

-Chanchal Sakshi
10th Sep 2014




Saturday, May 23, 2015

Struggle

जिंदगी में कितना कुछ है करने को 
फिर भी हम नौकरी करते है 
ताकी जीवन संवर जाए 

बहुत कुछ है कहने को 
फिर भी हम चुप रहते है 
ताकी कुछ न बिगड़ जाए 

shortcut बहुत है सफल होने को 
फिर भी हम long-way जाते है
ताकी न  बिखर जाए 

-चंचल साक्षी   
23/05/15

Friday, April 3, 2015

Memories

भले मेरे पलके नम हो जाये 
आने दो ख़यालो के साये 
वो अमरुद का पेड़ 
वो झूले का शोर 
मासूम सी बचपन 
और पत्तो का ढ़ेर 
वो मासूम मुस्कराहट 
खेतो की हरियाली 
धुप की जगमगाहट 
वो मिटटी का घरौंदा 
लगाये छोटा पौधा 
हम दो चार 
सब मिलके यार 
खेलते गुली डंडा 
वो आम का महीना 
वो बड़ी फुलवाड़ी
हम बच्चे फिर रहते कहीं ना 
कच्चे आम खाना 
बनाते हज़ार बहाना 
घर आकर भले ही डांट खाना 
बेफिक्र सी वो बचपन 
नखरों का नज़राना 
भले ही अब न सच हो पाये 
आने दो ख़यालो के साये
-चंचल साक्षी 
21-02-15
12:57 AM  

Dream